बहलाता दिलासों से जब भी मायूसियों से मिलता हूँ
अपने जीने के लिए रोज़ चेहरा नया बदलता हूँ
महफिलों में जाने से अब नही डरता कभी
ज़ख्मों पे घर से ही नमक मल के निकलता हूँ
फैजे तसव्वुर से कशां कशां आ ही जाते हो
हर उदास रात मैं यूँ ही तो बहलता हूँ
दर्द-ऐ-शबे हिज्र में इक बात अजब सी देखी
नमी में आंसुओं की तमाम रात जलता हूँ
फिर फेक दिया जाता हूँ मैं संगज़ारों के बीच
जब भी खा ठोकरें मैं ज़रा संभालता हूँ
बस कुछ ही चिंगारियां बची हैं याद-ऐ-फिराक़ की
यह भी बुझ जायें तो अपने सफर को चलता हूँ
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ReplyDeleteGreat as usual. lekin aap ki shaan mein kuchh arz karne ki gustakhi ki izaazat chahta hoon -
ReplyDeletesafar pe jaane ki jaldi kya hai
duniya to duniya hai
phir aisi naarazagi kya hai
Log aap ke raham ko bhi kabhi zulm samajhte hain
kyonki
aapke zakhmon pe male namak
kabhi doosaron ke zakhmon pe bhi girte hain