Friday, March 4, 2011
Tuesday, November 3, 2009
सराब
बहलाता दिलासों से जब भी मायूसियों से मिलता हूँ
अपने जीने के लिए रोज़ चेहरा नया बदलता हूँ
महफिलों में जाने से अब नही डरता कभी
ज़ख्मों पे घर से ही नमक मल के निकलता हूँ
फैजे तसव्वुर से कशां कशां आ ही जाते हो
हर उदास रात मैं यूँ ही तो बहलता हूँ
दर्द-ऐ-शबे हिज्र में इक बात अजब सी देखी
नमी में आंसुओं की तमाम रात जलता हूँ
फिर फेक दिया जाता हूँ मैं संगज़ारों के बीच
जब भी खा ठोकरें मैं ज़रा संभालता हूँ
बस कुछ ही चिंगारियां बची हैं याद-ऐ-फिराक़ की
यह भी बुझ जायें तो अपने सफर को चलता हूँ
अपने जीने के लिए रोज़ चेहरा नया बदलता हूँ
महफिलों में जाने से अब नही डरता कभी
ज़ख्मों पे घर से ही नमक मल के निकलता हूँ
फैजे तसव्वुर से कशां कशां आ ही जाते हो
हर उदास रात मैं यूँ ही तो बहलता हूँ
दर्द-ऐ-शबे हिज्र में इक बात अजब सी देखी
नमी में आंसुओं की तमाम रात जलता हूँ
फिर फेक दिया जाता हूँ मैं संगज़ारों के बीच
जब भी खा ठोकरें मैं ज़रा संभालता हूँ
बस कुछ ही चिंगारियां बची हैं याद-ऐ-फिराक़ की
यह भी बुझ जायें तो अपने सफर को चलता हूँ
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